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(श्रध्दांजलि) करुणा की चादर !


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


(नोट - लेख अच्छा लगे या बुरा कृपया टिप्पणी करना न भूले! धन्यवाद!)



























मदर टेरेसा

हर इंसान को उसके जीवनकाल में कई बार गरीबी और जानलेवा बीमारियों से लाचार दुखियों के दर्शन होते है! ज्यादातर लोग उन्हें देखकर अपने सौभाग्य पर इतराते है! अगर किसी में दयालुता जागती भी है, तो माया का मोह उसे बाँध लेता है! वह उन लोगो की बुरी हालत को उनके कर्मफल मानकर चुपचाप आगे बढ़ जाता है! बहुत कम लोग ऐसे होते है, जो करुणा की चादर बनकर उनके दुःख-दर्द मिटाने की ठान लेते है! ऐसी ही महान हस्तियों में एक थी- मदर टेरेसा! तत्कालीन युगोस्लाविया के स्कोंप्जे (अब मक्दूनिया) में 27 अगस्त 1910 में जन्मी एग्नेस गोंक्जा बोजाज्यू अठारह वर्ष की उम्र में 'लोरेटो सिस्टर्स' में दीक्षा लेकर सिस्टर टेरेसा बनी! इसके बाद वे भारत आकर अन्य ईसाई ननों की तरह अध्यापन से जुड़ गई! उन्होंने १७ वर्ष तक कोलकाता के सेंट मैरिज हाई स्कूल में भूगोल पढाया! फ़िर एक दिन कोन्वेन्त की दीवारों के बाहर फैली पीडा और दरिद्रता ने उन्हें विचलित कर दिया! उन्होंने कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य शुरू किया और वहा के बच्चो को पढाने के लिए 1948 में एक स्कूल खोला! फ़िर 7 अक्टूम्बर 1950 को उन्होंने 'मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी' की स्थापना की! काम इतना बढ़ गया कि 1996 तक उनकी संस्था ने 125 देशो में 755 निराश्रित गृह खोल दिए, 5 लाख लोगो की भूख मिटाने लगी तथा ढाई लाख लोगो के इलाज में जुट गई! 'दरिद्रनारायण' से तादात्म्य स्थापित करने के लिए वे हमेशा नीली किनारी की सफ़ेद धोती पहनती थी, जो उन दिनों कोलकाता के सफईकर्मियो की वेशभूषा में शामिल थी!
धर्मान्तरण का आरोप हर मिशनरी पर लगता रहा है, जिसके जवाब में मदर टेरेसा ने अपने जीवनी-लेखक नवीन चावला से कहा- "मेरा लक्ष्य हिन्दू को बेहतर हिन्दू, मुसलमान को बेहतर मुसलमान और ईसाई को बेहतर ईसाई बनाना है!" उन्होंने बताया कि उनकी प्रार्थना सभा में नियमित रूप से आने वाले 475 लोगो में सिर्फ़ 30 ही कैथोलिक है! मदर टेरेसा की अनन्य सेवाओ के कारण उन्हें भारत सरकार ने पदमश्री, नेहरू पुरस्कार तथा सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा! विदेशो में भी उन्हें मैगसेसे, बलजान, टेम्पलटन तथा नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किए गए! इसके बावजूद अन्य मनस्वियों की तरह उनके आलोचकों की भी कमी नही रही! जो लोग सक्षम होने के बावजूद स्वधार्मियो की दुर्दशा पर आँखे मूंद लेते है, उन्हें भी किसी मशीनरी के सेवा कार्य में खोट नजर आ जाता है! मदर टेरेसा के आलोचकों में क्रिस्टोफर हिचेन्स, अरुण शौरी तथा धीरू शाह आदि शामिल है! किसी ने उन पर किताब लिखी तो किसी ने लेख लिखकर उनका विरोध किया!
फ़्रांसीसी लेखक डोमिनिक लापियर कोलकाता पर 'सिटी ऑफ़ जॉय' लिखकर भारत में मशहूर हो गए! उन्होंने भी मदर टेरेसा पर टेलीफिल्म बनाने की 29 दिसम्बर 1982 को सहमती ले ली थी! लापियर ने इस टेलीफिल्म 'मदर टेरेसा: इन द नेम ऑफ़ गोड्स पूअर' की पटकथा स्वीकृति के लिए भेजी, तो मदर टेरेसा को उस पर कई आपतिया हुई! उन्हें दूर कर लापियर ने पटकथा दुबारा भेजी, पर मदर टेरेसा को संशोधन भी सतही लगा! इसके बाद उन्होंने 7 नवम्बर 1990 को पत्र लिखकर स्वीकृति ही वापस ले ली! लापियर इस फ़िल्म को भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से बनाना चाहते थे, पर मदर टेरेसा की आपतियों के कारण परियोजना सिरे नही चढी! बाद में लापियर ने श्रीलंका में शूटिंग कर टेलीफिल्म बनाई, जिसे अमेरिका के फैमिली चैनल पर प्रसारित किया गया! फ़्रांसीसी अभिनेत्री जेराल्डीन चैपलिन ने भी इसमे काम किया! इन्ही वाद-विवादो के बीच 5 सितम्बर 1997 को मदर टेरेसा का देहावसान हो गया! यूँ तो मदर टेरेसा अपने जीवनकाल में ही 'जीवित संत' मानी जाने लगी थी, पर वेटिकन ने अगले ही वर्ष उनके 'बिएतिफिकेशन' (धन्य घोषणा) की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी! इसके लिए 5 साल अनिवार्यता भी पॉप जोन पॉल द्वितीय ने ख़त्म कर दी! मदर टेरेसा को 19 अक्टूम्बर 2003 को धन्य घोषित किया गया! आज मदर टेरेसा के ये शब्द अनगिनत लोगो को प्रेरित कर चुपचाप सेवा कार्य में ताल्लीन रखे हुए है - 'बोलने से पहले जरुरी है कि आप सुने, क्योकि परमात्मा ह्रदय के मौन में ही मुखर होता है!'