
किसी भी खेल में देश का नाम विश्व में रोशन करने वाले को देशवासी पलकों पर बिठा लेंगे.
तक़दीर अगर साथ दे, तो आदमी गिर कर उठता है और फ़िर अपने हौसले से बुलंदी छू लेता है! बुधवार को यही बीजिंग ओलम्पिक में भारतीय पहलवान सुशील कुमार के साथ हुआ! पहले ही मुकाबले में पराजय के बाद उन्होंने लगातार तीन पहलवानों को शिकस्त देकर पुरुषों के फ्रीस्टाइल 66 किलो वर्ग मुकाबले का एक कांस्य पदक जीतकर भारत की खुशिया दुगुनी कर दी! गत सप्ताह दस मीटर एयर राइफल निशानेबाजी स्पर्ध्दा में अभिनव बिंद्रा स्वर्ण पदक लाये थे! तब भी देशभर में खुशी की लहर फ़ैल गई थी, पर सुशील की जीत इस मायने में अनोखी है कुश्ती में सामान्यजन को तो कतई पदक की कोई उम्मीद नही थी! सब लोगो को निशानेबाजों और मुक्केबाजों से ही आशा थी! विजेंद्र ने 75 किलो मिडिलवेट मुक्केबाजी के क्वार्टर फाइनल में इक्वाडोर के कार्लोस गोंजोरा को हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया, जिससे उम्मीद जिन्दा है!
भारतीय कुश्ती फैडरेशन के पदाधिकारियों ने अवश्य बीजिंग रवानगी के पूर्व कुछ उम्मीदे बाँधी थी, पर तब यही समझा गया कि हर संघ खिलाडियों की हौसला अफजाई के लिए यही कहता है! भारतीय दल में तीन पहलवान ही भेजे गए थे - योगेश्वर दत्त, सुशील कुमार और राजीव तोमर! सुशील की विजय से इन पहलवानों के बेलारूस में सात दिन और क्यूबा में दो हफ्ते के प्रशिक्षण का औचित्य भी साबित हुआ है! वैसे भी इन पहलवानों ने बीजिंग ओलम्पिक की योग्यता उन अंतर्राष्ट्रीय स्पर्ध्दाओ से हासिल की, जिनमे विश्व के श्रेष्ठ पहलवान हिस्सा ले रहे थे!
सुशील को बुधवार सुबह जब पहले ही मुकाबले में यूक्रेन के आंद्रेय स्तादनिक ने शिकस्त दे दी, तो सबको लगता था कि अब वे होड़ से बाहर हो गए है! इसके बाद उनको तक़दीर ने तब एक मौका दिया, जब स्तादनिक फाइनल में पहुँच गए! नियम ये है कि फाइनल में पहुचने वाले पहलवानों से पराजित पहलवानों के बीच 'रेपिचाज' मुकाबले होते है और उनसे ही दो कांस्य पदको का फ़ैसला होता है! किस्मत से मिले इस मौके का सुशील ने पूरा फायदा उठाया! इस स्पर्ध्दा का स्वर्ण पदक तुर्की के रमजान शाहीन ने और दूसरा कांस्य पदक जार्जिया के ओतार तुशीशविली को मिला!
भारत में पहलवानी द्वापर और त्रेता युग से ही चली आ रही है! तब इसे 'मल्ल्युध्द' कहा जाता था! कालांतर में गामा पहलवान, दारा सिंह , मेहरदीन, चंदगीराम, गुरु हनुमान और सतपाल ने देश में नाम रोशन किया! सुशील के गुरु सतपाल है, जिन्हें उनके चेले की कामयाबी पर दिल्ली सरकार ने बारी से पहले पदोन्नति देने की घोषणा की है!
पहलवानी में आज से 56 वर्ष पूर्व के के. डी. जाधव ने हेलसिंकी ओलम्पिक में फ्रीस्टाइल बेंटमवेट वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया था! सुशील की जीत ने जो समा बाँधा, उससे एक घंटे के अन्दर ही उनके लिए रेलवे में सहायक वाणिज्यिक प्रबंधक की पदोन्नति के साथ डेढ़ करोड़ रुपये के पुरस्कारों की घोषणा हो गई! इससे लगता है कि अब हमारे लिए कोई भी खेल महत्वहीन नही रह गया है! किसी भी खेल में देश का नाम विश्व में रोशन करने वाले को देशवासी पलकों में बिठा लेंगे! यह अवश्य है कि क्रिकेट का आकर्षण कुछ अधिक है, जिससे उसका महत्त्व सर्वाधिक बना रहेगा! आशा है कि अभिनव, विजेंद्र और सुशील कुमार की जीतो से दूसरे खेलो के खिलाड़ी भी अब मन लगाकर कुछ करने की कोशिश करेंगे! उन्हें अब ऐसा नही लगेगा कि उन्होंने खेल के चयन में कुछ गलती की!
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