
क्या दहाड़ फ़िर गूंजेगी?
जगमोहन डालमिया,पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष.
आखिरकार,जनसमूह और कैमरों की भीड़, जश्न और कोलाहल के तूफ़ान के बीच वह घाघ बुजुर्ग खिलाड़ी अपने पुराने मैदान पर लौट आया है! जब बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष और क्रिकेट एसोसिएसन ऑफ़ बंगाल (सीएबी) के मुखिया जगमोहन डालमिया ने उन गलियारों में दोबारा प्रवेश किया जहाँ से उन्होंने विश्व क्रिकेट में अपनी हैसियत बनाई थी, तो माहौल में आए परिवर्तन को साफ़ महसूस किया जा सकता था!
डालमिया ने ताकतवर बीसीसीआई के सत्ता समीकरण को धत्ता बताते हुए राज्य क्रिकेट के एकतरफा चुनाव में जीत हासिल की! उदारमना और बातूनी डालमिया, जिन्हें बंगाल का समूचा क्रिकेट जग्गू दा के नाम से संबोधित करता है, विस्तार से बताया कि उनका ध्यान हमेशा पश्चिम बंगाल के क्रिकेट, उसके मैदान और क्लबों पर रहा! लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ नही बताया कि उनकी भावी योजनाए क्या है! कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि वे लोग भी नही जो उन्हें 1990 के दशक से जानते है, राष्ट्रीय मंच पर उनके दोबारा उभरने के खिलाफ दांव लगाना पसंद करेंगे!
प्रतिबंधित और अपमानित डालमिया जब 2005 में क्रिकेट की राजनीति में शरद पंवार से हार गए थे तो उन्हें बीसीसीआई के मौजूदा प्रशासन ने क्रिकेट जगत से वस्तुतः बहिष्कृत कर दिया था! पंवार खेमे ने उन पर 4 करोड़ का गबन का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी की ! वह मामले को अदालत में भी ले गया! लेकिन दिलचस्प बात ये है कि डालमिया ने दिसम्बर, 2006 में सीएबी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद से असामान्य चुप्पी साध ली थी! उन्होंने कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त प्रसून मुखर्जी ले लिए मैदान खाली कर दिया था ताकि वे सीएबी का कार्यभार संभाल सके! अब ईडन गार्डन में डालमिया की वापसी से कई लोगो का मानना है कि वे कई गुना ताकतवर होकर उभरेंगे!
चुनाव के पहले, डालमिया ने एक स्थानीय अख़बार से यह कहा था, "ईडन मेरा दूसरा घर है! मै किसी समय भी वापस आ सकता हू!" मुखर्जी पर उनकी जीत ने यही साबित किया! उन्हें 71 और मुखर्जी को 47 वोट मिले थे! डालमिया को अपनी पहले की जीत के मुकाबले यह जीत अधिक सुस्वादु लगी होगी जिसे वे लंबे समय तक याद रखेंगे! सतारूढ़ गुट के जले पर नमक यह कि सीएबी पदों के लिए उनके सभी उम्मीदवार भी जीत गए और मुखर्जी खेमे का सफाया कर दिया!
हार के बाद,
प्रसून मुखर्जी, पूर्व पुलिस आयुक्त, प. बंगाल.
सन्, २००६ में हुए चुनाव के विपरीत राज्य सरकार ने इस बार मुखर्जी, जो अब पुलिस आयुक्त नही है, का समर्थन नही किया! पिछली बार भी वे डालमिया से हार गए थे, लेकिन महज पाँच वोटो से! उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य काफी मुखर हो गए थे और मुखर्जी के समर्थन में बोलते हुए डालमिया को 'दुष्ट शक्ति' बताया था! इस बार मुखर्जी के लिए इस तरह का कोई समर्थन सामने नही आया! गौरतलब है कि रिजवानुर रहमान मामले में उन्होंने अपना रिकोर्ड दागदार बना लिया था और राज्य सरकार और पुलिस की काफ़ी किरकीरी हुई थी! मुखर्जी के कार्यकाल में आरोप लगे थे कि सीएबी को महज एक टेस्ट मैच के दौरान 41 लाख रुपये का घाटा हुआ!
सीएबी के चुनाव में उसकी सभी मान्यता प्राप्त इकाईया डालमिया के समर्थन में एकजुट हो गई थी! इसीलिए वे जीत हासिल करने में सफल रहे थे! ये इकाईया आईपीएल में हुए मुनाफे में अधिक हिस्से की मांग कर रही थी! लेकिन मुखर्जी ने मांग पर ध्यान नही दिया जिससे उनके खिलाफ असंतोष फ़ैल गया ! डालमिया ने इस असंतोष का फायदा उठाते हुए सीएबी की सभी इकाईयों को अपने पक्ष में कर लिया!
मुखर्जी ने कहा कि उन्हें हारने के लिए साजिश रची गई थी! उन्होंने कहा, "मेरे तथाकथित समर्थको ने वोट नही दिए, मुझे आगे कुछ नही कहना है !" जब डालमिया के मोबाईल फोन पर बीसीसीआई के मौजूदा पदाधिकारियों कोछोडकर दुनिया भर से क्रिकेट अधिकारियो और खिलाडियों के बधाई संदेश आने लगे तो वे खुशी से झूम रहे थे और अपनी विनम्र महत्वाकांक्षा के बारे में बता रहे थे! उन्होंने कहा,"मेरी पहली प्राथमिकता बंगाल क्रिकेट और सीएबी प्रशासन को दुरुस्त करना है!" उन्होंने रणजी ट्रोफी से राज्य के बाहर हो जाने पर नाखुशी जाहिर की और कहा कि "यह हमारे लिए बहुत अपमान की बात है, खिलाड़ी स्वाभाविक रूप से एलीट ग्रुप में खेलना चाहते थे!अब वे दूसरे राज्यों की टीम में जगह तलाशने की कोशिश कर सकते है! हमें इस बात पर विचार करना होगा कि हम इसे किस तरह रोक सकते है!"
उनके पुराने सहयोगी के.के. बोस भी चुनाव के दौरान अपने बॉस के साथ रहने के लिए अमेरिका से वापस लौट कर आ गए! दोनों को एक साथ देखकर लगा कि पुराना समय वापस आ गया है! बीसीसीआई के चुनाव एक महीने में होने वाले है और डालमिया सीएबी के बॉस के रूप में वोट डालने जा सकते है! सितंबर में चुनाव जैसे जैसे करीब आते जायेंगे, डालमिया अपने पुराने सहयोगियों अरुण जेठली, ब्रजेश पटेल, अमिताभ चौधरी और रणबीर सिंह महेंद्र को एकजुट कर लेंगे जिससे सतारूढ़ लॉबी हतोत्साहित हो सकती है!
जहा तक बीसीसीआई पर काबिज होने की बात है, तो डालमिया के लिए इस साल कुछ भी नही है क्योकि पंवार के वफादार शंशाक मनोहर पहले ही अध्यक्ष पद के लिए मनोनीत हो चुके है! लेकिन अगली बार भारतीय क्रिकेट का रिमोट कंट्रोल हासिल करने के लिए उनके पास रणनीति बनाने का काफ़ी समय है! दूसरी तरफ़, यह सवाल पूछे जाने पर डालमिया ने कहा, "मै एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हू कि मै सत्ता पर दावेदारी जताने के लिए वापस नही आया हू! मै एक लम्बी और सफल पारी खेल चुका हूँ! इस बार मै राज्य क्रिकेट का स्तर सुधारने का मिशन लेकर सीएबी में वापस आया हूँ!"
लेकिन उनकी योजनाओ में टकराव के बीज भी है! वे अभिषेक झुनझुनवाला,दीप दासगुप्ता,रोहन गावस्कर और शिव सागर जैसे वरिष्ठ खिलाडियों को जी समर्थित बागी आईसीएल से वापस लाना चाहते है! डालमिया ने कहा,"हम आईसीएल और बोर्ड से बात करेंगे तथा खिलाडियों को वापिस लाने की कोशिश करेंगे!" फिलहाल, बीसीसीआई के लिए आईसीएल अछूत बना हुआ है!
बीसीसीआई के गलियारों में खतरे की घंटी बजने लगी है और इस तरह की अफवाहे है कि डालमिया पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जायेगी और उनके खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया जाएगा!
लेकिन डालमिया आशावादी है, वे कहते है,"मै अफवाहों पर ध्यान नही देता! मै सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि अगर उनके पास मेरे खिलाफ कुछ है तो मुझसे लड़े! मै निजी तौर पर उसके लिए तैयार हूँ! मुझे उम्मीद है कि वे इसमे एसोसिएसन को शामिल नही करेंगे!" जहा तक उनकी राष्ट्रीय महत्वकांशा का सवाल है, तो वे कहते है,"राष्ट्रीय स्तर पर क्या हो रहा है, मुझे नही मालूम! मेरा कोई भी एजेंडा नही है!" बहरहाल वनवास के बाद डालमिया के दिन फिरते दिख रहे है!
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