
(नोट - लेख अच्छा लगे या बुरा टिप्पणी करना न भूले! धन्यवाद !)
राष्ट्रीय गौरव विश्वनाथन आनंद.कम ही लोग रहे है खेल इतिहास में जो स्थायी तौर पर चैम्पियन की कुर्सी पर इस तरह जमे हो! दुनिया को भारत की देन शतरंज के खेल के वे बेताज बादशाह है! 29 सितम्बर 2007 को विश्व शतरंज चैम्पियन बने 39 वर्षीय विश्वनाथन आनंद अक्टूम्बर में उसी खिताब की रक्षा के लिए व्लादिमीर क्रामनिक से भिड़ने की तैयारी कर रहे है! दिमाग में विचारो की रफ़्तार से चाल चल देने की काबिलियत के चलते आनंद को लाइटनिंग किड का उप - नाम मिला!
जुलाई, 1991 में टॉप 10 में पहुँचने के बाद वे हमेशा इस खेल के शीर्ष की हलचलों में रहे! खेल की बारीकिया उन्होंने माँ सुशीला से सीखी और शुरूआती दिनों में देश में कोई कोचिंग भी नही ली! कम उम्र में ही मोहरों की गहरी स्तिथियों की समझ विकसित कर लेने के अलावा चालो के मामले में द्रढ़ता और पूर्वाभास ने उन्हें दूसरो से अलग किया! हालांकि शतरंज में देश की पहली मौलिक प्रतिभा दिव्येंदु बरुआ थे पर मुल्क के लोगो का ध्यान अपनी निरंतर कामयाबियों के बूते आनंद ने ही खीचा, प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने की उनकी रफ़्तार हैरतंगेज रही है! वाकपटु, शतरंज की किताबो तक पहुँच और फ़िर कंप्यूटर पर अपनी पकड़ से वे देश में दूसरे प्रतिद्वंदियों से काफी आगे निकल गए!
विश्व चैम्पियन अनातोली कारपोव के ख़िलाफ़ बहुप्रतीक्षित मुकाबले से पहले ब्रुसेल्स में जा टिकने और गैरी कोस्पॉरोव के पूर्व सहयोगी मिखाइल गुरेविच से प्रशिक्षण लेने के उनके फैसले ने उन्हें बड़ी मदद की! उन्हें यह भी समझ आया कि खेल के लिहाज से यूरोप में रहना जरुरी है! पत्नी अरुणा के साथ वे चैन्ने से स्पेन में मेड्रिड के पास एक छोटे कस्बे कोलाडा मेडियानो में जा बसे! आनंद ने विश्व चैपियंस पर पहली दफा 1995 में नजर गढाई जब वे न्युयोर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टॉप फ्लोर पर 20 बाजियों वाले इस मुकाबले में गैरी कास्पोरोव से बढ़त लेके खेल रहे थे! पर स्तिथिया नाटकीय ढंग से बिगड़ती गई! वह खिताब उन्हें 2000 में तेहरान में जाकर मिला! उसी साल उन्होंने विश्व कप और वर्ल्ड रैपिड एंड ब्लिट्ज टाइटल भी जीते! इस वक्त तक आनंद दुनिया की सभी शीर्ष प्रतियोगिताए जीत चुके थे! चाहे वह विज्क आन जी हो, लिनारेस हो या दोर्तमन्द,मेंज,लियोन और कोर्सिका जैसी स्पर्धाए वस्तुतः लगातार जीतने की वजह से वे निर्विवाद रैपिड किंग कहलाये!
उसके बाद उन्होंने रेटिंग में 2800 अंको को पार करने और दुनिया में नंबर 1 बनने पर ही ध्यान क्रेंदित किया! आखिरकार पिछले वर्ष कैरियर में पहली दफा उन्होंने वह एक अंक सीमा पार की! आनंद ने एक ही साल में हुगोवेन और लिनोरेस जैसी स्पर्धाए जीतने का दुर्लभ डबल भी बनाया! हुगोवेन/कोरस टूर्नामेंट पाँच बार जीतने वाले वे दुनिया के अकेले खिलाडी है! शतरंज की ग्रेंड स्लेम सरीखी माने जाने वाली हुगोवेन और लिनारेस जैसी स्पर्धाए जीतना आनंद की महानता की कहानी कहता है! रैपिड चेस में वे सबसे कामयाब खिलाडी है, जहाँ खिलाड़ी को 20 से 30 मिनट दिए जाते है! रैपिड और क्लासिक दोनों शैलियों में महारत के साथ वे खेल के इतिहास के एक पूर्ण खिलाड़ी बनने की देहरी पर है! दोनों शैलियों में इस तरह तालमेल बिठाने वाला कोई दूसरा खिलाड़ी नही है!
उम्र के छठे साल में खेलना शुरू करने वाले आनंद ने 14 की उम्र में नेशनल सब - जूनियर चैंपियनशिप के रूप में पहला खिताब जीता और 16वे वर्ष में राष्ट्रिय चैम्पियन बन गए! 18 की उम्र में तो देश के पहले ग्रेंड मास्टर थे! इस रफ्तार से हासिल की गयी उपलब्धियों की वजह से ही वे शतरंज प्रतिभाओ के लिए प्रेरणा स्रोत बने! अनद को इस बात का मलाल रहा है कि शतरंज को दर्शको के बीच लोकप्रिय बनाने की खास कोशिश नही की गई! बहरहाल, वे खुश है कि 2016 के ओलम्पिक में शतरंज भी होगा और तब शायद वे हिन्दुस्तान को इस खेल का पहला ओलम्पिक स्वर्ण दिलाये!

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