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बदलती तकनीक और रिसर्च की बदौलत क्रिकेट के जिस सामान से पिछले कुछ सालो में सबसे ज्यादा छेड़छाड़ हुई है वह बैट है! असल में क्रिकेट है तो बैट और गेंद का मुकाबला! गेंद के नियम बहुत सख्त है और गेंद के रंग को बदलने की कोशिश भी अभी तक कामयाब नही हुई है!बैट के साथ पहले भी बल्लेबाज प्रयोग करते थे लेकिन प्रयोग बैट के वजन से जुड़े थे और खेलने के तरीके तथा शारीरिक मजबूती के आधार पर अपने बैट चुनते थे!
अब सिर्फ़ वजन ही आधार नही है! रिसर्च की बदौलत नियमो के दायरे में बैट को बदलने की कोशिश होती रही! रिकी पोंटिंग का 'कुकाबुरा - कहुना' और माइकल हसी का 'कुकाबुरा - बीस्ट' बैट बहुत मशहूर हुए! आजकल के क्रिकेटर इंग्लैंड की कंपनी ग्रे निकोल्स के 'फ्यूजन' बैट को पसंद कर रहे है! क्या ये सभी बैट सही है? क्या इन बैट से खेलने वाले उन बल्लेबाजो की तुलना में फायदे की स्थिति में नही जो सामान्य बैट से खेलते है!
एम.सी.सी. की कमेटी ने आखिरकार बैट के सवाल पर चर्चा की और इस बात पर जोर दिया कि बैट के नियम को फ़िर से लिखने का समय आ गया है! एम.सी.सी. क्रिकेट कमेटी में किसी नियम को मंजूरी के लिए दो तिहाई बहुमत जरुरी है लेकिन बैट पर नए नियम के प्रस्ताव को 98.6 प्रतिशत वोट मिले!
मूल मन्त्र एक ही है - कोई भी बैट इस तरह नही बदलने दिया जायेगा कि बल्लेबाज को शोट लगाने में अतिरिक्त मदद दे! इसी के साथ पोंटिंग, हसी और हेडन द्वारा प्रयोग किए बैट पर प्रतिबन्ध लग गया! एम.सी.सी. लॉ कमेटी के जॉन स्टीफंसन ने कहा - "कुकाबुरा ने बैट पर ग्रेफाईट की परत लगाई(बैट जो 2006 में पोंटिंग ने प्रयोग किया) जबकि नियम इसकी इजाजत नही देते! पिछले साल ग्रे निकोल्स ने ऐसा बैट बना दिया कि जिसमे हेंडल बनाने में ग्रेफाईट टाईटेनियम काप्रयोग हुआ! नियम इसकी भी इजाजत नही देते पर नियमो में इन्हे रोकने के लिए कुछ भी नही था! इसीलिए नियमो को नए सिरों से लिखना जरुरी हो गया!"
असल में हुआ ये कि ग्रे निकोल्स ने ग्रेफाईट और टाईटेनियम का प्रयोग से बैट के हेंडल को हल्का कर दिया और जो वजन बचा उससे ब्लेड को मजबूत कर दिया! इस तरह बैट का वजन बढे बिना बल्लेबाज को ज्यादा वजन वाले ब्लेड से खेलने का मौका मिल गया!
स्टीफंसन ने कहा -"क्रिकेट तो है ही बैट और गेंद का मुकाबला और अगर यूँ बल्लेबाज को फायदा पहुचाने के लिए बैट बदलते रहेंगे तो सही मुकाबला कहाँ रह जायेगा? शताब्दियों में पिच,बॉउंड्री और गेंद में कोई बदलाव नही आया लेकिन बैट बदले है! आज बल्लेबाज के ग़लत शोट पर भी गेंद छक्के के लिए उछल जाती है! आधुनिक ट्रेनिंग के तरीको ने बल्लेबाज का शरीर मजबूत बना दिया और नए बैट के साथ इसका फायदा उठा रहे है!"
नए नियम के अनुसार बैट के हेंडल का ९० प्रतिशत हिस्सा केन,वुड और ट्वाइन का बना हो जबकि कम्पन रोकने के लिए 10 प्रतिशत हिस्सा अन्य सामान (जैसे रबर) का हो सकता है! नियम में यह भी लिखा कि हेंडल की लंबाई बैट की लंबाई से 52 प्रतिशत से ज्यादा नही होनी चाहिए! इसके अतिरिक्त बैट को बचाने और रिपेयर करने के लिए किस तरह के सामान का प्रयोग होगा यह भी लिखा है!
आई.सी.सी. के लिए नियम बनाने की जिम्मेदारी अभी तक एम.सी.सी. के पास है! एम.सी.सी. ने तो नियम बना दिया लेकिन यह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में तभी लागू होगा जब आई.सी.सी. मंजूरी देगी! आई.सी.सी. ने वैसे एम.सी.सी. के इस नियम को सभी क्रिकेट एसोसिएसन के पास भेज दिया है और निर्देश की एक ख़ास बात यह है कि फ्यूजन बैट के प्रयोग को फ़ौरन नही रोका है! भारतीय बोर्ड ने सभी क्रिकेट एसोसिएसन को बैट के नए नियम कि जानकारी देते हुए इसके फ़ौरन प्रयोग को नही रोका!
एम.सी.सी. ने बैट के बारे में फैसला लेने से पहले बैट बनाने वाली विश्व कि मशहूर कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ साथ खेल विशेषज्ञों से भी बात की! बैट बनाने वालो को आर्थिक नुकसान न हो इसीलिए तय हुआ कि जो कार्बन ग्रेफाईट वाले बैट बाजार में है उनसे सितम्बर तक खेल सकते है! 1 अक्टूम्बर तक हर तरह की क्रिकेट में इन बैट का प्रयोग बंद हो जायेगा! उसके बाद ऐसा बैट प्रयोग करने वाले पर आजीवन प्रतिबंध लग सकता है!
भारतीय बोर्ड में निर्देश में लिखा है - हल्के हेंडल से बैट घुमाने में तेजी आती है और बल्लेबाज को फायदा मिलता है जिससे शोट जोरदार लगता है! इस समय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में हेडन, फिल जेक्स,जेकब ओराम और एंड्रयू स्ट्रोस फ्यूजन बैट से बल्लेबाजी करते है!
इतिहास बताता है कि बैट बनाने वाले अभी भी कुछ न कुछ नया ढूंढ़ लेंगे!
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