
एक ऐसा ही क्रिकेटर अपनी कहानी बताने को तैयार हो गया!इस शर्त पर कि उसका नाम नहीं लिखेंगे!वह उन क्रिकेटर में है जिन्हें जिम्बाम्ब्वे वाले भविष्य कि उम्मीद गिनते है- नेशनल एकेडमी से कोचिंग ले चुका है,जिम्बाम्ब्वे 'ए' के लिए खेल चुका है और अपने प्राविंस कि टीम का खास खिलाडी है!इस पेशेवर क्रिकेटर को जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट हर महीने (ऑफ सीजन में) 6 पाउंड (इनकी ब्लैक करे तो ६० करोड़ जिम्बाम्ब्वे डॉलर मिल जायेंगे) देती है!उसे मिलने वाले जिम्बाम्ब्वे डॉलर की बड़ी गिनती से प्रभावित होने कि कोई जरुरत नहीं-महंगाई इतनी है कि हद से ज्यादा और जिम्बाम्ब्वे डॉलर ऐसी बेकार करेंसी है कि कई स्टोर इसे लेने के लिए भी इनकार करते है!ऐसे में 6 पाउंड से पूरा महिना कहा चलेगा?यह क्रिकेटर जिंदगी चलाने के लिए ब्लैक मार्किटिंग करता है-जो आप मांगे वह मिलेगा!शराब,विदेशी करेंसी और लड़किया-कुछ देर रुकिए वह पार्क में ही सबकुछ उपलब्ध करा देगा!जब उससे ये बात हो रही थी तो उसके जेब में जिम्बाम्ब्वे के 10 करोड़ डॉलर थे-जिन्हें उसने एक दिन में कमाया था!
जिम्बाम्ब्वे में क्रिकेटरों को 'अमीर' मानते है!कौनसे है ये अमीर क्रिकेटर?सिर्फ वे 13 क्रिकेटर जिनके पास जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट का सेंट्रल कांट्रेक्ट है!जिस क्रिकेटर कि आप कहानी सुन रहे है वह उन 20 में है जिनके पास रिटेनरशिप कांट्रेक्ट है और सिर्फ 6 पाउंड देकर जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट चाहती है कि हर महीने और इसी तरह पूरे साल उपलब्ध रहे!
उसने कहा- "जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट को हमारी याद तभी आती है जब आई.सी.सी. को दिखाने के लिए लोगन कप(प्रथम श्रेणी) या फेथवियर कप(एकदिवसीय) खेलना हो क्योकि आई.सी.सी. से ग्रांट लेने के लिए इन टूर्नामेंट के लिए खेलने का दिखावा जरुरी है!" बस एक बार टूर्नामेंट ख़त्म तो जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट को कोई चिंता नहीं कि इन क्रिकेटरों का क्या होगा?जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट को ये भी चिता नहीं कि ऑफ सीजन में ये प्रक्टिस कैसे करेंगे?6 पाउंड में तो हर रोज एकेडमी तक बस में आने जाने का टिकट भी नहीं आता!
पूरे साल ऐसे क्रिकेटर उस एक महीने का इंतजार करते है जब लोगन और फैथवियर कप खेलते है- उन दिनों में होटल में रहते है, नए कपडे पहनते है,पेट भर खाना मिलता है,फिर भी इस तरह के क्रिकेटरों को "आउट ऑफ पाकेट एलाउंस" नहीं मिलता!इसकी तुलना में आई.सी.सी. की ग्रांट में से बोर्ड अधिकारी बिजनेस क्लास में हवाई यात्रा करते है,खूब डेली अलाउंस लेते है,विदेश आते जाते रहते है और अच्छी होटलों में ठहरते है!दूसरी तरफ जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट ने तय किया है कि खर्चा बचाने के लिए लोगन और फैथवियर कप के दौरान टीमे स्कूल के हॉस्टल में ठहरेगी और बदले में स्कूली क्रिकेटरों को कोचिंग देंगे!
इस तरह के क्रिकेटरों की हालत तभी सुधर सकती है जब जिम्बाम्ब्वे में लगातार क्रिकेट हो या जिम्बाम्ब्वे की किसी टीम के साथ विदेश में खेलने का मौका मिल जाए!2007-08 जिन क्रिकेटरों को दक्षिण अफ्रीका के दूसरे स्तर के टूर्नामेंट में खेलने का मौका मिला- उनके लिए सबसे बड़ी राहत ये थी कि पेट भर खाना मिला और रैंड में डेली एलाउंस!जो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके है और शुरू में सिर्फ क्रिकेट को ही सहारा समझा उन सभी कि हालत यह है- इसीलिए ऑफ सीजन में सभी छोटे मोटे काम करते है!कोई भीख मांगता है,कोई ब्लैक मार्किटिंग तो कोई मोबाइल रेपयेरिंग!
जब तक जिम्ब्बाम्ब्वे क्रिकेट ईमानदार नहीं होगी- वहा क्रिकेट और क्रिकेटरों कि हालत सुधरेगी नहीं!इस साल जब फैथफियर कप में पिछले चैम्पियन नार्दरनस के लिए एल्टन चिगम्बरा नहीं खेला तो जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट ने इस बात को छिपाया कि वह जिम्बाम्ब्वे क्रिकेट को छोड़ गया है- कह दिया कि वह फिट नहीं है!सच्चाई यह है कि उससे तीन दिन पहले उसने उतरी इंगलैंड में एथलतन क्रिकेट क्लब के लिए खेलना शुरू कर दिया था!सेन्ट्रल कांट्रेक्ट के नियमो के अनुसार वह बोर्ड कि इजाजत के बिना कोई कांट्रेक्ट नहीं ले सकता!बोर्ड ने इजाजत नहीं दी तो उसने कांट्रेक्ट की ही चिंता नहीं कि और जिम्बाम्ब्वे छोड़ गया!
इस तरह बोर्ड एक और क्रिकेटर को खोने के करीब है!2007-08 का सीजन शुरू होने के समय बोर्ड ने कहा था की 2 जून को सीजन ख़त्म होने के बाद खिलाडियों को कही भी खेलने से नहीं रोकेंगे!
आई.सी.सी. इन हालात से बेखबर क्यों है?सिर्फ ग्रांट देने से आई.सी.सी. कि जिम्मेदारी पूरी नहीं होगी!

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